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اگه مهتاب باشه يا نه |
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تو بزرگي |
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مث ِ شب. | |
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جاری چون رود.....شاعر چون چشمه....بی پروا چون آبشار
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تو بزرگي مث ِ شب.
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اگه مهتاب باشه يا نه |
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تو بزرگي |
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مث ِ شب. | |
خود ِ مهتابي تو اصلاً، خود ِ مهتابي تو.
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تازه، وقتي بره مهتاب و |
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هنوز |
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شب ِ تنها |
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بايد |
راه ِ دوريرو بره تا دَم ِ دروازهي ِ روز ــ
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مث ِ شب گود و بزرگي |
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مث ِ شب. |
تازه، روزم که بياد
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تو تميزي |
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مث ِ شبنم |
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مث ِ صبح. | |
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تو مث ِ مخمل ِ ابري |
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مث ِ بوي ِ علفي |
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مث ِ اون ململ ِ مه نازکي: |
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اون ململ ِ مه |
که رو عطر ِ علفا، مثل ِ بلاتکليفي
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هاج و واج مونده مردد |
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ميون ِ موندن و رفتن |
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ميون ِ مرگ و حيات. | |
مث ِ برفايي تو.
تازه آبم که بشن برفا و عُريون بشه کوه
مث ِ اون قلهي ِ مغرور ِ بلندي
که به ابراي ِ سياهي و به باداي ِ بدي ميخندي...
من باهارم تو زمين
من زمينام تو درخت
من درختام تو باهار،
ناز ِ انگشتاي ِ بارون ِ تو باغام ميکنه
ميون ِ جنگلا تاقام ميکنه.
احمد شاملو،
این شعر زیبا تقدیم به تو مک آرتور به خاطر مهربانی های بی سر و صدایت![]()